आओ हम सब मिल कर देश का नाम बढ़ाएं।
राष्ट्रमंडल खेल में आवारा कुतों की अगवानी कर आयें ।
आओ हम सब...
देखो हम कितने बड़े पशु प्रेमी हैं की हम ने कुत्तों के लिए घर बन वाएं हैं।
उन को खेल गाँव के कमरों में रजाई पर सुला आयें हैं।
करोड़ों रुपयों से बने स्टेडियम में कुते खेल दिखायेंगे
इस तरह हम अपने देश का नाम ऊँचा कर पाएंगे ।
ये दुनिया में अपने तरह का अजूबा होगा
जब आवारा कुतों को करोडो रुपयों से बने Sतेदियम में अपनी प्रतिभा दिखाते नजर आयेंगे
नए नए कीर्तिमान स्थापित होंगे
और अपने देश का नाम पशु प्रेमियों में अग्रगण्य हो जायेगा
क्या क्या नहीं किया है हम ने
ढेर सरे फ्लाई ओवर बनवाएं हम ने
बाँट बाँट कर पैसे घर लाये हम ने
भाई चारा का सन्देश फैलाया हम ने
तो देशवासियों अब मौका हाँथ से जाने न दो
थोड़े से पुल और गिरवा दो
कुछ बेरोजगार लोगों स्वर्ग का रास्ता दिखा दो
कुछ बेरोजगआरों को काम पे लगा दो
इस तरह बेरोजगारी भी घटा दो॥
आओ देश का नाम ऊँचा कर दो
Wednesday, September 22, 2010
Friday, December 18, 2009
sankalit
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते-खाक हैं फानी , रहे रहे न रहे
एक सपने को टालते रहने से क्या होता है ?
क्या वह सुख जाता है
किशमिश सा धुप में ?
या जख्म सा पक जाता हैं
और फिर रिसा करता हैं ?
मुमकिन है वह सिर्फ लच जाता हो
भारी बोझे जैसा
कहीं वह बारूद -सा फट तो नहीं पड़ता ?
ये मुश्ते-खाक हैं फानी , रहे रहे न रहे
एक सपने को टालते रहने से क्या होता है ?
क्या वह सुख जाता है
किशमिश सा धुप में ?
या जख्म सा पक जाता हैं
और फिर रिसा करता हैं ?
मुमकिन है वह सिर्फ लच जाता हो
भारी बोझे जैसा
कहीं वह बारूद -सा फट तो नहीं पड़ता ?
Sunday, November 15, 2009
अँधेरा नहीं प्रतीक है शैतानी ताकत का॥
अँधेरा प्रतीक है वर्षों से कमजोर बेसहारा वर्गों का
जिसकी प्रस्तुती ग़लत ढंग से की गयी हैं।
अगर अँधेरा न होता तो
क्या आप आराम से सो पाते
अँधेरा तो सर्वहारा वर्ग का प्रतीक हैं
आप अमीर हैं गरीब हैं वो सब को इक नजर से देखता है
आप वस्त्रो से लिपटे हैं या नंगे हैं सब पर उस की सामान दृष्टि हैं
आप नंगे हैं तो वो आप की इज्जत का ख्याल करता हैं
वर्षो से सब ने चिथडा चिथडा किया , उसकी बाहें काती उसके प्रशस्त सीने को चीर चीर कर रख दिया
फिर भी वो खामोश बैठा है, चुपचाप बैठा है
आप की सुख सुविधा के लिए॥
अँधेरा कभी भी उजालें पर आक्रमण नही करता है
वो शांत प्रवृति का वयक्ति है पर उस को जीने कौन देता है
रात लहूलुहान बैठा है चुचाप हर कोई आक्रमण कर रहा है
मत मारो अंधेरे को छोड़ दो उस को
वो अनादी काल से पीटता आ रहा hai
अँधेरा प्रतीक है वर्षों से कमजोर बेसहारा वर्गों का
जिसकी प्रस्तुती ग़लत ढंग से की गयी हैं।
अगर अँधेरा न होता तो
क्या आप आराम से सो पाते
अँधेरा तो सर्वहारा वर्ग का प्रतीक हैं
आप अमीर हैं गरीब हैं वो सब को इक नजर से देखता है
आप वस्त्रो से लिपटे हैं या नंगे हैं सब पर उस की सामान दृष्टि हैं
आप नंगे हैं तो वो आप की इज्जत का ख्याल करता हैं
वर्षो से सब ने चिथडा चिथडा किया , उसकी बाहें काती उसके प्रशस्त सीने को चीर चीर कर रख दिया
फिर भी वो खामोश बैठा है, चुपचाप बैठा है
आप की सुख सुविधा के लिए॥
अँधेरा कभी भी उजालें पर आक्रमण नही करता है
वो शांत प्रवृति का वयक्ति है पर उस को जीने कौन देता है
रात लहूलुहान बैठा है चुचाप हर कोई आक्रमण कर रहा है
मत मारो अंधेरे को छोड़ दो उस को
वो अनादी काल से पीटता आ रहा hai
Tuesday, October 6, 2009
वक्त
वक्त हाथों से रेत की तरह फिसलता जा रहा हैं।
कोई तो मुझे बताये हाथ से जो रेत फिसल रहा है उसको कैसे रोकें
आदत सी हो गयी हैं हवा में किला बना ने की
और उस किला को मैं ख़ुद भी नही देख पता हूँ
कोई तो मुझे बताये हाथ से जो रेत फिसल रहा है उसको कैसे रोकें
आदत सी हो गयी हैं हवा में किला बना ने की
और उस किला को मैं ख़ुद भी नही देख पता हूँ
समस्या
बड़ी बड़ी बातें करने में बहुत आनंद की अनुभूति होती हैं। इस की तुलना आप पुराने ज़माने के शाश्त्राथ से कर सकते हैं।
हम सभी लोग वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर ऊँची ऊँची बातें करते हैं। देश के लिए, समाज के लिए. विश्व के लिए।
पर हम से कितने लोग हैं जो मूलभूत समस्या के समाधान के लिए जमीनी पहल करते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसा करते हैं।
जो लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं उन में से कितने लोगों ने भारत वर्ष की आत्मा से ख़ुद को जोड़ कर देखा हैं।
कितने लोगों ने दूर दराज के गावों को पास जा कर निहारा हैं। उन की समस्या को बखूबी समझा हैं.
हम सभी लोग वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर ऊँची ऊँची बातें करते हैं। देश के लिए, समाज के लिए. विश्व के लिए।
पर हम से कितने लोग हैं जो मूलभूत समस्या के समाधान के लिए जमीनी पहल करते हैं। बहुत ही कम लोग ऐसा करते हैं।
जो लोग बड़ी बड़ी बातें करते हैं उन में से कितने लोगों ने भारत वर्ष की आत्मा से ख़ुद को जोड़ कर देखा हैं।
कितने लोगों ने दूर दराज के गावों को पास जा कर निहारा हैं। उन की समस्या को बखूबी समझा हैं.
Sunday, September 20, 2009
भारत
अपने भारत वर्ष को इंडिया से बचाओ । भारत को इंडिया से खतरा हो गया है। अपने देश का नाम अपने देश की भाषा में लो। हमारे आप के जैसे लोग अपने देश को भारत नहीं बोलते हैं , इंडिया बोलते हैं। मुझे तो अस्तित्व का खतरा नजर आता है।
कई बार तो ऐसा भी होता हैं। मेरे दोस्तों ने बोला है की मुझे हिन्दी में लिखी बातें पढ़ने में दिक्कत होती है। इस में उनकी गलती नही हैं। गलती है तो हमारी मनो-दसा की है गुरुता का आवरण के लिए हम अंग्रेजी का सहारा लेते जा रहे हैं.
कई बार तो ऐसा भी होता हैं। मेरे दोस्तों ने बोला है की मुझे हिन्दी में लिखी बातें पढ़ने में दिक्कत होती है। इस में उनकी गलती नही हैं। गलती है तो हमारी मनो-दसा की है गुरुता का आवरण के लिए हम अंग्रेजी का सहारा लेते जा रहे हैं.
Sunday, May 10, 2009
कुछ यूँ हीं
प्रभु से पिरितिया लग जावे रे लग जावे रे
प्रभु से पिरितिया .....
सब दुःख दूर हो जावे रे...
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
मनवा बैकुंठ बस जावे रे
जो प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
सब तीरथ के दर्शन हो जावे रे
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
अपना -पराया का बंधन टूट जावे रे
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
गुन अवगुण यश -अपयश से दूर हो जावे रे
ओ मनवा तू भव सागर पार हो जावे रे॥
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे....
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे...
प्रभु से पिरितिया .....
सब दुःख दूर हो जावे रे...
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
मनवा बैकुंठ बस जावे रे
जो प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
सब तीरथ के दर्शन हो जावे रे
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
अपना -पराया का बंधन टूट जावे रे
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे
गुन अवगुण यश -अपयश से दूर हो जावे रे
ओ मनवा तू भव सागर पार हो जावे रे॥
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे....
जब प्रभु से पिरितिया लग जावे रे...
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About Me
- Mukul
- मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सोचता बहुत हूँ पर करता कुछ भी नहीं हूँ. इस से अच्छा मेरा परिचय कुछ भी नहीं हो सकता है मैं खयालों की दुनिया में जीने वाला इन्सान हूँ . सच्चाई के पास रह कर भी दूर रहने की कोशिश करता हूँ अगर सच्चाई के पास रहूँगा तो शायद चैन से नहीं रह पाउँगा पर हर घड़ी सत्य की तलाश भी करता रहता हूँ . शायद आप को मेरी बातें विरोधाभाषी लग रही होगी पर सच्चाई यही हैं.. ये बात सिर्फ मुझ पर हीं नहीं लागू होती है शायद हम में से ज्यादातर लोगों पर लागू होती है. मैं तो गांव में पला -बढा ,शहर की बारीकियों से अनजान इक गंवई इन्सान हूँ जिसे ज्यादातर शहर के तौर तरीके पता नहीं हैं.