तुम संग संग जो चले
फूलों का शहर हैं
तेरी यादों का डगर हैं
तुम संग संग जो चले
फिजा में तेरी खुशबू हैं
दिन तेरी ही रुत में ढले
तुम संग संग जो चले
चाँद धीरे धीरे चले
फागुनी बयार कुछ अनकही कहे
चैता चित्त करे चंचल
तुम संग संग जो चले
Friday, March 20, 2009
Wednesday, February 18, 2009
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
धरती सजी है संवरी है पीली अलसी खिली है ॥
सब की आंखों में खुमार है , ढेर सरे सतरंगे सपने भी हैं ..
हवा धीरे धीरे छू रही हैं ..
सरे लक्षण वसंत के हैं
पर ना जाने क्यों मुझे लगता है
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
ऐसा नहीं की तुम नहीं हो यहाँ
तुम येही कही बैठी हो अपना सुब कुछ लेकर ॥
और अपना सुब कुछ किसी को उधार दे कर ...
यहाँ तुम्हारा तन बैठा हैं ..
मन कही और उदास बैठा ...
तभी तो
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
मेरे कई सतरंगे सपने हैं ..
पैर इनका क्या करून ...
मेरे सपने आम्र के बोरों की खुसबू लिए बैठे ..
महुआ के पेड़ के आस -पास भटक रही ॥
उसे लगता है तुम्हारा मन येही कहीं छुपा है।
मेरे सरे सतरंगी सपने उदास हैं ...
मेरे लिए ॥
इन वासंती हवाओं में ... ना वसंत का अल्हड़पन है ना पागलपन है ....
तो क्या करून ...
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
मैं दूर पहाड़ की चोटी पर बैठा ..
सबकी बातों को पर विचार कर रहा हूँ
ऊँची चोटी पे बैठा हूँ तो सब बौने लग रहे हैं ..
सब पयार में छोटे हो गए हैं खो गए हैं ...
मैं पहाड़ की चोटी पे बैठा गुरुता की भावना लिए हूँ ...
तो कैसे आयेगी वासन्ती हवा मेरे पास
फिर भी मैं कहता हूँ
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
धरती सजी है संवरी है पीली अलसी खिली है ॥
सब की आंखों में खुमार है , ढेर सरे सतरंगे सपने भी हैं ..
हवा धीरे धीरे छू रही हैं ..
सरे लक्षण वसंत के हैं
पर ना जाने क्यों मुझे लगता है
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
ऐसा नहीं की तुम नहीं हो यहाँ
तुम येही कही बैठी हो अपना सुब कुछ लेकर ॥
और अपना सुब कुछ किसी को उधार दे कर ...
यहाँ तुम्हारा तन बैठा हैं ..
मन कही और उदास बैठा ...
तभी तो
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
मेरे कई सतरंगे सपने हैं ..
पैर इनका क्या करून ...
मेरे सपने आम्र के बोरों की खुसबू लिए बैठे ..
महुआ के पेड़ के आस -पास भटक रही ॥
उसे लगता है तुम्हारा मन येही कहीं छुपा है।
मेरे सरे सतरंगी सपने उदास हैं ...
मेरे लिए ॥
इन वासंती हवाओं में ... ना वसंत का अल्हड़पन है ना पागलपन है ....
तो क्या करून ...
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
मैं दूर पहाड़ की चोटी पर बैठा ..
सबकी बातों को पर विचार कर रहा हूँ
ऊँची चोटी पे बैठा हूँ तो सब बौने लग रहे हैं ..
सब पयार में छोटे हो गए हैं खो गए हैं ...
मैं पहाड़ की चोटी पे बैठा गुरुता की भावना लिए हूँ ...
तो कैसे आयेगी वासन्ती हवा मेरे पास
फिर भी मैं कहता हूँ
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
Thursday, January 1, 2009
मृत्यु का गीत
आओ
इस नव वर्ष की शुभ वेला पर,
सब मिल कर मृत्यु का गीत गायें
नवजीवन का अलख जगाएं
अँधियारा ही सूरज को लेकर आता है
अम्बर पर ज्ञान प्रकाश फैलाता है
डरो मत आज इस नव वर्ष रुपी यज्ञ की वेदी पे ,
दे दो आहुति सारे कुविचारों की
असत अनैतिक के मृत्यु का गीत
खोले द्वार ,सदगुण के , नया विहान का , नया सूरज का
तो आओ आज हम साब मिलकर मृत्यु का गीत गायें
इस नव वर्ष की शुभ वेला पर,
सब मिल कर मृत्यु का गीत गायें
नवजीवन का अलख जगाएं
अँधियारा ही सूरज को लेकर आता है
अम्बर पर ज्ञान प्रकाश फैलाता है
डरो मत आज इस नव वर्ष रुपी यज्ञ की वेदी पे ,
दे दो आहुति सारे कुविचारों की
असत अनैतिक के मृत्यु का गीत
खोले द्वार ,सदगुण के , नया विहान का , नया सूरज का
तो आओ आज हम साब मिलकर मृत्यु का गीत गायें
मुझे समय बना दो
मुझे समय बना दो
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
Wednesday, October 1, 2008
ये धमाके नये नहीं हैं.
आज संपूर्ण भारतवर्ष सहमा सा है घबराया सा है धमाकों से । ये धमाके नये नहीं हैं अनादी काल कब कब कब रहे हैं।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
Saturday, August 2, 2008
खुद से ही हैरान हूँ
जीवन एक तुला के समान हैं । सामंजस्य बिठाना बहुत आसान काम नहीं होता हैं । जीता हैं वही जीवन के ज़ंग को जिस ने सिखा हैं संतुलन बनाना ।
जिस को भी देखो कोई खुश नही हैं सब भाग दौड़ कर रहा हैं । जो आज खुश दिखता हैं वो कल रोता नजर आता हैं। चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी अगर मिल जाए तो वही सत्य हैं !
कभी कभी मुझे लगता हैं कि ये चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी की तलाश भी मृगतृष्णा है । कुछ भी निरपेक्ष नही हो सकता है, सब कुछ सापेक्ष है । आप को विवेचना करनी होगी । मानव के साथ समस्या है की point of reference ढूंढ तो लेता है पर वो "point of रेफेरेंस " भी निरपेक्ष नही होता है । इस बात से एक बात निकल कर सामने आती हैं की कुछ भी स्थिर नही है । सब कुछ गतिमान है । मुझे लगता है कि एक जो स्थिर हो सकता है वो इश्वर हो सकता है ।
अभी मैं इश्वर की विवेचना में नही जाना चाहता हूँ क्यों की मेरे चर्चा की विषय वस्तु वो नही है तो मैं ये कहना चाह रहा था कि दुःख का कारण क्या है ?
दुःख का कारण है आप की apekshaaon(Expectations) का पुरा ना होना ।
और आप का compartive study की negativity ॥
आज इतना आगे फिर बात करेंगे ॥
जिस को भी देखो कोई खुश नही हैं सब भाग दौड़ कर रहा हैं । जो आज खुश दिखता हैं वो कल रोता नजर आता हैं। चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी अगर मिल जाए तो वही सत्य हैं !
कभी कभी मुझे लगता हैं कि ये चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी की तलाश भी मृगतृष्णा है । कुछ भी निरपेक्ष नही हो सकता है, सब कुछ सापेक्ष है । आप को विवेचना करनी होगी । मानव के साथ समस्या है की point of reference ढूंढ तो लेता है पर वो "point of रेफेरेंस " भी निरपेक्ष नही होता है । इस बात से एक बात निकल कर सामने आती हैं की कुछ भी स्थिर नही है । सब कुछ गतिमान है । मुझे लगता है कि एक जो स्थिर हो सकता है वो इश्वर हो सकता है ।
अभी मैं इश्वर की विवेचना में नही जाना चाहता हूँ क्यों की मेरे चर्चा की विषय वस्तु वो नही है तो मैं ये कहना चाह रहा था कि दुःख का कारण क्या है ?
दुःख का कारण है आप की apekshaaon(Expectations) का पुरा ना होना ।
और आप का compartive study की negativity ॥
आज इतना आगे फिर बात करेंगे ॥
Tuesday, July 15, 2008
अब तो रिसते हैं रिश्ते
कल तक कम से कम अपने भारतवर्ष में रिश्तों में सच्चाई तो थी अब रिश्ते भी छोटे हो गए हैं। कल तक उनका दायरा बहुत बड़ा था अब वो बहुत सिमट गए हैं ।
आप पूछेंगे कैसे ?
चलिए मैं आप को उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ॥
अब चाचा चाची मामा मामी फुआ फूफा सब अंकल एंड आंटी हो गए हैं ...
अपने जितने भी तरह के भाई बहन होते थे सब कजिन हो गए हैं...
तो रिश्ते छोटे नही हो गए हैं उनकी परिभाषा बदल गयी हैं।
आज कल नाभिकीय परिवार का चलन भी जोर पर है।
संयुक्त परिवार अब कम नजर आते हैं॥
वृद्ध होते माँ बाप ओल्ड एज होम में नजर आते हैं।
आप पूछेंगे कैसे ?
चलिए मैं आप को उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ॥
अब चाचा चाची मामा मामी फुआ फूफा सब अंकल एंड आंटी हो गए हैं ...
अपने जितने भी तरह के भाई बहन होते थे सब कजिन हो गए हैं...
तो रिश्ते छोटे नही हो गए हैं उनकी परिभाषा बदल गयी हैं।
आज कल नाभिकीय परिवार का चलन भी जोर पर है।
संयुक्त परिवार अब कम नजर आते हैं॥
वृद्ध होते माँ बाप ओल्ड एज होम में नजर आते हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)
About Me
- Mukul
- मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सोचता बहुत हूँ पर करता कुछ भी नहीं हूँ. इस से अच्छा मेरा परिचय कुछ भी नहीं हो सकता है मैं खयालों की दुनिया में जीने वाला इन्सान हूँ . सच्चाई के पास रह कर भी दूर रहने की कोशिश करता हूँ अगर सच्चाई के पास रहूँगा तो शायद चैन से नहीं रह पाउँगा पर हर घड़ी सत्य की तलाश भी करता रहता हूँ . शायद आप को मेरी बातें विरोधाभाषी लग रही होगी पर सच्चाई यही हैं.. ये बात सिर्फ मुझ पर हीं नहीं लागू होती है शायद हम में से ज्यादातर लोगों पर लागू होती है. मैं तो गांव में पला -बढा ,शहर की बारीकियों से अनजान इक गंवई इन्सान हूँ जिसे ज्यादातर शहर के तौर तरीके पता नहीं हैं.