आओ
इस नव वर्ष की शुभ वेला पर,
सब मिल कर मृत्यु का गीत गायें
नवजीवन का अलख जगाएं
अँधियारा ही सूरज को लेकर आता है
अम्बर पर ज्ञान प्रकाश फैलाता है
डरो मत आज इस नव वर्ष रुपी यज्ञ की वेदी पे ,
दे दो आहुति सारे कुविचारों की
असत अनैतिक के मृत्यु का गीत
खोले द्वार ,सदगुण के , नया विहान का , नया सूरज का
तो आओ आज हम साब मिलकर मृत्यु का गीत गायें
Thursday, January 1, 2009
मुझे समय बना दो
मुझे समय बना दो
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
Wednesday, October 1, 2008
ये धमाके नये नहीं हैं.
आज संपूर्ण भारतवर्ष सहमा सा है घबराया सा है धमाकों से । ये धमाके नये नहीं हैं अनादी काल कब कब कब रहे हैं।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
Saturday, August 2, 2008
खुद से ही हैरान हूँ
जीवन एक तुला के समान हैं । सामंजस्य बिठाना बहुत आसान काम नहीं होता हैं । जीता हैं वही जीवन के ज़ंग को जिस ने सिखा हैं संतुलन बनाना ।
जिस को भी देखो कोई खुश नही हैं सब भाग दौड़ कर रहा हैं । जो आज खुश दिखता हैं वो कल रोता नजर आता हैं। चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी अगर मिल जाए तो वही सत्य हैं !
कभी कभी मुझे लगता हैं कि ये चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी की तलाश भी मृगतृष्णा है । कुछ भी निरपेक्ष नही हो सकता है, सब कुछ सापेक्ष है । आप को विवेचना करनी होगी । मानव के साथ समस्या है की point of reference ढूंढ तो लेता है पर वो "point of रेफेरेंस " भी निरपेक्ष नही होता है । इस बात से एक बात निकल कर सामने आती हैं की कुछ भी स्थिर नही है । सब कुछ गतिमान है । मुझे लगता है कि एक जो स्थिर हो सकता है वो इश्वर हो सकता है ।
अभी मैं इश्वर की विवेचना में नही जाना चाहता हूँ क्यों की मेरे चर्चा की विषय वस्तु वो नही है तो मैं ये कहना चाह रहा था कि दुःख का कारण क्या है ?
दुःख का कारण है आप की apekshaaon(Expectations) का पुरा ना होना ।
और आप का compartive study की negativity ॥
आज इतना आगे फिर बात करेंगे ॥
जिस को भी देखो कोई खुश नही हैं सब भाग दौड़ कर रहा हैं । जो आज खुश दिखता हैं वो कल रोता नजर आता हैं। चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी अगर मिल जाए तो वही सत्य हैं !
कभी कभी मुझे लगता हैं कि ये चिरन्तन सत्य चिन्मय खुशी की तलाश भी मृगतृष्णा है । कुछ भी निरपेक्ष नही हो सकता है, सब कुछ सापेक्ष है । आप को विवेचना करनी होगी । मानव के साथ समस्या है की point of reference ढूंढ तो लेता है पर वो "point of रेफेरेंस " भी निरपेक्ष नही होता है । इस बात से एक बात निकल कर सामने आती हैं की कुछ भी स्थिर नही है । सब कुछ गतिमान है । मुझे लगता है कि एक जो स्थिर हो सकता है वो इश्वर हो सकता है ।
अभी मैं इश्वर की विवेचना में नही जाना चाहता हूँ क्यों की मेरे चर्चा की विषय वस्तु वो नही है तो मैं ये कहना चाह रहा था कि दुःख का कारण क्या है ?
दुःख का कारण है आप की apekshaaon(Expectations) का पुरा ना होना ।
और आप का compartive study की negativity ॥
आज इतना आगे फिर बात करेंगे ॥
Tuesday, July 15, 2008
अब तो रिसते हैं रिश्ते
कल तक कम से कम अपने भारतवर्ष में रिश्तों में सच्चाई तो थी अब रिश्ते भी छोटे हो गए हैं। कल तक उनका दायरा बहुत बड़ा था अब वो बहुत सिमट गए हैं ।
आप पूछेंगे कैसे ?
चलिए मैं आप को उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ॥
अब चाचा चाची मामा मामी फुआ फूफा सब अंकल एंड आंटी हो गए हैं ...
अपने जितने भी तरह के भाई बहन होते थे सब कजिन हो गए हैं...
तो रिश्ते छोटे नही हो गए हैं उनकी परिभाषा बदल गयी हैं।
आज कल नाभिकीय परिवार का चलन भी जोर पर है।
संयुक्त परिवार अब कम नजर आते हैं॥
वृद्ध होते माँ बाप ओल्ड एज होम में नजर आते हैं।
आप पूछेंगे कैसे ?
चलिए मैं आप को उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ॥
अब चाचा चाची मामा मामी फुआ फूफा सब अंकल एंड आंटी हो गए हैं ...
अपने जितने भी तरह के भाई बहन होते थे सब कजिन हो गए हैं...
तो रिश्ते छोटे नही हो गए हैं उनकी परिभाषा बदल गयी हैं।
आज कल नाभिकीय परिवार का चलन भी जोर पर है।
संयुक्त परिवार अब कम नजर आते हैं॥
वृद्ध होते माँ बाप ओल्ड एज होम में नजर आते हैं।
Saturday, June 28, 2008
मह्त्वपूर्ण क्या है ??
आइये आज हम बातें करें समस्याओं की
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आप की भी कोई न कोई समस्या रही होगी या अभी भी होगी या आने वाली होगी
इस धरातल पर भांति भांति के लोग रहते हैं
आइये हम लोग मिल जुल कर लोगों का वर्गीकरण उनकी समस्याओं के आधार पर करते हैं।
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आप की भी कोई न कोई समस्या रही होगी या अभी भी होगी या आने वाली होगी
इस धरातल पर भांति भांति के लोग रहते हैं
आइये हम लोग मिल जुल कर लोगों का वर्गीकरण उनकी समस्याओं के आधार पर करते हैं।
- व्यक्ति जो अपनी वर्तमान की समस्याओं से जूझ रहा है
- व्यक्ति जो अपनी बीती समस्याओं से जूझ रहा है
- व्यक्ति जो आने वाली समस्याओं में खोया हुआ है
- दूसरों की समस्याओं के समाधान में लगा हुआ
मैं यह नहीं जानता की आप किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं पर मुझे पता है की हम सभी एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं ।
बाकी बातें कल करेंगे....
Thursday, May 22, 2008
राष्ट्र कैसा हो?
एक प्रश्न है मेरे पास , अपना देश कैसा हो ? बहुत पैसा हो, अमन-चैन हो । क्या हो अपने देश में? सब के अपने अपने विचार होंगे ,पर जहां तक मेरा मानना है की हमारे राष्ट्र के लोग शक्तिशाली हों। अपने राष्ट्र में कमजोर लोग कम से कम हों। मैं यह नहीं कह रहा हूँ की सारे लोग शारीरिक रूप से शक्तिशाली हों पर ये बात तो जरूर हो की कोई कमजोर नहीं हो।
मेरे मन में एक राष्ट्र की कल्पना है जो उर्जा के क्षेत्र में धनी हो॥
वो उर्जा जो भी हो...
:-) मानव की शारीरिक शक्ति के रूप में हो
:-) मानव की मानसिक शक्ति हो
:-) अध्यात्मिक शक्ति हो
:-) मानव की सामरिक शक्ति हो मतलब राष्ट्र की सामरिक शक्ति
:-) हर प्रकार की उर्जा जो राष्ट्र को आगे ले जाए
फिर अगर अपने देश का मानव स्वस्थ हो, दृढ़ निश्चयी हो तो बाकी सारी तरह की उर्जा की प्राप्ति हो सकती है।
जहां तक मानव के स्वस्थ होने की बात है इस के लिए हमें ,यानी हमारे राष्ट्र को क्या करना होगा॥
मैं चाहता हूँ की इस प्रश्न का उत्तर आप की तरफ से आए
(धन्यबाद)
सादर
मुकुल
मेरे मन में एक राष्ट्र की कल्पना है जो उर्जा के क्षेत्र में धनी हो॥
वो उर्जा जो भी हो...
:-) मानव की शारीरिक शक्ति के रूप में हो
:-) मानव की मानसिक शक्ति हो
:-) अध्यात्मिक शक्ति हो
:-) मानव की सामरिक शक्ति हो मतलब राष्ट्र की सामरिक शक्ति
:-) हर प्रकार की उर्जा जो राष्ट्र को आगे ले जाए
फिर अगर अपने देश का मानव स्वस्थ हो, दृढ़ निश्चयी हो तो बाकी सारी तरह की उर्जा की प्राप्ति हो सकती है।
जहां तक मानव के स्वस्थ होने की बात है इस के लिए हमें ,यानी हमारे राष्ट्र को क्या करना होगा॥
मैं चाहता हूँ की इस प्रश्न का उत्तर आप की तरफ से आए
(धन्यबाद)
सादर
मुकुल
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About Me
- Mukul
- मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सोचता बहुत हूँ पर करता कुछ भी नहीं हूँ. इस से अच्छा मेरा परिचय कुछ भी नहीं हो सकता है मैं खयालों की दुनिया में जीने वाला इन्सान हूँ . सच्चाई के पास रह कर भी दूर रहने की कोशिश करता हूँ अगर सच्चाई के पास रहूँगा तो शायद चैन से नहीं रह पाउँगा पर हर घड़ी सत्य की तलाश भी करता रहता हूँ . शायद आप को मेरी बातें विरोधाभाषी लग रही होगी पर सच्चाई यही हैं.. ये बात सिर्फ मुझ पर हीं नहीं लागू होती है शायद हम में से ज्यादातर लोगों पर लागू होती है. मैं तो गांव में पला -बढा ,शहर की बारीकियों से अनजान इक गंवई इन्सान हूँ जिसे ज्यादातर शहर के तौर तरीके पता नहीं हैं.