Wednesday, June 8, 2011
प्रेम का स्वरुप
जब तुम पहली बार मिली थी
मैं ही तुम था, तुम थी मैं.
अब तुम ही तुम हो और मैं भी हम तुम
कल तक था मैं प्राण प्यारा
तुम थी मेरी प्राण प्यारी
अब मैं हूँ बहुत बड़ा बेचारा
करता हूँ घर का काम सारा
कल तक तेरी आँखें ढूंढती थी मुझ को
अब भी ढूंढती तेरी आँखें , पर मुझे नहीं मेरे पर्श को
कल तक थी तेरी आँखों में चाँद की रोशनी
अब लेकर बैठी हो अपनी आँखों में सूरज की रोशनी
तभी तो सर छुपाये बैठा हूँ
मरने के baad
चील कुत्तों को खिलाओगे ,जलाओगे, जमीन के नीचे दफ़न कर दोगे या पानी के प्रवाह में फेक दोगे.
मुझे उसकी चिंता नहीं हैं
मैं अभी जिन्दा हूँ.
मुझे भर पेट भोजन चाहिए
चाहो तो मेरे आँखों को मरने के बाद दान कर देना..
पर मुझे अभी अँधा न बनाओ..
दुनिया देखने दो, सही गलत का निर्णय करने दो
मेरे पेट में कुछ नहीं छुपा है भूखा हूँ मैं
अगर मेरे पास तुम्हारी तरह बहुत कुछ होता
तो स्विस बैंक में मेरा भी अकाउंट होता..
कल मैं ने यही तो कहा था
थोड़े से पैसे स्विस बैंक से ले आओ
मेरी भूख मिट जायेगी
तुम ने क्या किया.
रात में आये बहुत मारा पिटा
दुर्बल हूँ हाय लगेगी मेरी
और तुम्हारा हाड मांस गल जायेगा
और चील कौवा बन कर आऊंगा
और तुम्हारा सदा गला मांस खाऊंगा
और प्रयावरण को सुद्ध करूंगा
दिग्विजय सिंह -आधुनिक भारत के जयचंद
Sunday, April 10, 2011
bhrstachar
कौन नहीं है इस जहां में भ्रष्ट
भ्रष्ट आचार तो भारत के जन-जन में समावेशित है
आज जो सब खड़े हैं भ्रस्टाचार के विरुद्ध में
उस में से जयादातर भ्रष्ट है
नेता को आसमान से नहीं टपक पड़ता है वो हमारे बीच का हीं एक समांन्य मानव होता है
जो की भ्रस्टाचार के बीच जन्म लेता है पलता है फलता है फूलता है तो वो भी भ्रस्टाचारी बन जाता है
क्या हम ने अपने अन्दर झांक कर देखा है हम कितने ईमानदार हैं और कितने चोर है हमारे अन्दर ईमानदारी का प्रतिसत क्या है और बेईमानी का प्रतिसत क्या है
जब एक बालक घर में जन्म लेता है तोसब कुछ वो घर से हीं तो सीखता हैं
अछे आचार-विचार या भ्रस्टाचार
एक बाबु का बेटा देखता है की उस के घर में सारी सामग्री उपलब्ध है जबकी उस के पिता की इतने समर्थ तो नहीं हैं तो वो चोरी करना हीं सीखेगा ना या वो ईमानदारी सीखेगा ...
आज का युवा जो IAS बन ता उस में कितने देश भक्ति की बात सोंचते हैं और कितने अपने घर को भरने की बात सोचते है। कितने डॉक्टर ग्रामीण इलाके में जाकर सेवा करना सोचते है। शायद १ प्रतिसत या उस से भी
अभी तो जन-मानस में अलख जगाने की जरूरत है ॥ चोरी करना बंद करो।
Friday, November 19, 2010
समय की आँखे
कोई मुझे अपनी आँखे दे दो.
पर तुम्हारी आँखें लेने से पहले जानना चाहूँगा
क्या तुम्हारी आँखें रोगमुक्त हैं
रोगी आँखें मैं नहीं लूँगा उधार..
चलो तुम्हारे आँखों का परिक्षण करवाता हूँ
कुछ नमूना प्रश्न तुम्हारी आँखों के लिए.
क्या तुम्हारी आँखें , तुम्हारे माता पिता के आँखों के दर्द को देख पाती हैं
क्या तुम्हारी आँखें कभी नम होती हैं , क्या इन दृग कोरों से कुछ बहता हैं
क्या तुम्हारी आँखें , उदास आँखों को पढ़ पाती हैं
करोड़ों जन मानस के दर्द को देख पाती हैं
क्या असमय बड़े हो रहे बच्चों को पहचान पाती हैं
उनकी उबलती आँखों में आक्रोश देख पाती हैं
अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए चीखती चिल्लाती धरा को पहचान पाती है
उत्तर सिर्फ हाँ या न में चाहिए
जायदा वक़्त जाया नहीं करूंगा
मैं समय हूँ मैं अपनी आँखे खो चूका हूँ
मुझे अनंत काल तक चलना हैं
जल्दी बताओ
फिर ये न कहना की समय समय की बात है
अँधा समय अंधे की तरह व्यहार करेगा?
Wednesday, September 22, 2010
आओ हम सब मिल कर देश का नाम बढ़ाएं।
राष्ट्रमंडल खेल में आवारा कुतों की अगवानी कर आयें ।
आओ हम सब...
देखो हम कितने बड़े पशु प्रेमी हैं की हम ने कुत्तों के लिए घर बन वाएं हैं।
उन को खेल गाँव के कमरों में रजाई पर सुला आयें हैं।
करोड़ों रुपयों से बने स्टेडियम में कुते खेल दिखायेंगे
इस तरह हम अपने देश का नाम ऊँचा कर पाएंगे ।
ये दुनिया में अपने तरह का अजूबा होगा
जब आवारा कुतों को करोडो रुपयों से बने Sतेदियम में अपनी प्रतिभा दिखाते नजर आयेंगे
नए नए कीर्तिमान स्थापित होंगे
और अपने देश का नाम पशु प्रेमियों में अग्रगण्य हो जायेगा
क्या क्या नहीं किया है हम ने
ढेर सरे फ्लाई ओवर बनवाएं हम ने
बाँट बाँट कर पैसे घर लाये हम ने
भाई चारा का सन्देश फैलाया हम ने
तो देशवासियों अब मौका हाँथ से जाने न दो
थोड़े से पुल और गिरवा दो
कुछ बेरोजगार लोगों स्वर्ग का रास्ता दिखा दो
कुछ बेरोजगआरों को काम पे लगा दो
इस तरह बेरोजगारी भी घटा दो॥
आओ देश का नाम ऊँचा कर दो
About Me
- Mukul
- मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सोचता बहुत हूँ पर करता कुछ भी नहीं हूँ. इस से अच्छा मेरा परिचय कुछ भी नहीं हो सकता है मैं खयालों की दुनिया में जीने वाला इन्सान हूँ . सच्चाई के पास रह कर भी दूर रहने की कोशिश करता हूँ अगर सच्चाई के पास रहूँगा तो शायद चैन से नहीं रह पाउँगा पर हर घड़ी सत्य की तलाश भी करता रहता हूँ . शायद आप को मेरी बातें विरोधाभाषी लग रही होगी पर सच्चाई यही हैं.. ये बात सिर्फ मुझ पर हीं नहीं लागू होती है शायद हम में से ज्यादातर लोगों पर लागू होती है. मैं तो गांव में पला -बढा ,शहर की बारीकियों से अनजान इक गंवई इन्सान हूँ जिसे ज्यादातर शहर के तौर तरीके पता नहीं हैं.