मैं अक्सर लोगों से सुनता रहता हूँ की मानव के अच्छे बुरे कर्मों का फैसला उन के दरबार में होता है, हर किसी को अपने कर्मो के अनुसार फल मिलता हैं इस लोक में नहीं तो पर-लोक में , रोचक एवं रोमांचकारी लगती हैं मुझे ये बातें।
लोग कह रहें हैं तो सत्य ही होगा मैं कौन होता हूँ इस पर सवालिया निशान उठाने वाला। मैं तो इक अदना सा इंसान हूँ जो इस मृत्युलोक लोक में आया हूँ और चला जाऊंगा जो कार्य मेरे लिए नियत किए गए हैं उनको करना होगा और चला जाऊंगा॥
मैं ये सोंच रहा था हमारे यहाँ कोर्ट-कचहरी में वेटिंग लिस्ट इतनी लम्बी होती हैं । कई बार ऐसा होता हैं की कोर्ट में फैसला भी नही होता हैं , लोगों स्वर्ग भी चले जाते हैं ।
जब यहाँ इतनी लम्बी line लगी हैं तो प्रभु के दरबार में किस तरह manage होता होगा उन की कार्य प्रणाली कैसी होगी वो कैसे manage करते होंगे । क्या सब को इतनी लम्बी line में justice मिल पता होगा।
क्या वहाँ छोटे जज नही होते होंगे क्या वहाँ witness को नहीं ख़रीदा जाता होगा।
मुझे नही पता हैं । तो जो parlok हैं अगर वहां सभी निर्णय सही होता हैं तो भगवन को अपने ढेर सारे represnentatives को भेज देना होगा । ख़ास कर भारत में कई हजार , मुझे तो लगता हैं यहाँ represntatives तो ढेर सारे हैं पर या तो वो लोग बदल गएँ नहीं तो we असुरों के representatives हैं।
इक mechanism और भी हैं येहाँ से ढेर लोग इश्वार के दरबार में जाएँ और वहां की न्याय प्रणाली भी समझ कर आयेंगे ॥
आप को पता हैं iskaa सब से बड़ा phayada क्या होगा आप anumaan लगा sakete हैं क्या मुझे लगता हैं कर लेंगे।
ये साधुओं का धंधा बंद हो जाएगा जो कहेते हैं मुझे इश्वर का पता हैं क्यों की फिर तो हमारे पास भी practical expereience वाला बंद होगा॥
आप के और हमारे बीच कोई आम नर /नारी ..
Sunday, April 12, 2009
Friday, March 20, 2009
तुम संग संग जो चले
तुम संग संग जो चले
फूलों का शहर हैं
तेरी यादों का डगर हैं
तुम संग संग जो चले
फिजा में तेरी खुशबू हैं
दिन तेरी ही रुत में ढले
तुम संग संग जो चले
चाँद धीरे धीरे चले
फागुनी बयार कुछ अनकही कहे
चैता चित्त करे चंचल
तुम संग संग जो चले
फूलों का शहर हैं
तेरी यादों का डगर हैं
तुम संग संग जो चले
फिजा में तेरी खुशबू हैं
दिन तेरी ही रुत में ढले
तुम संग संग जो चले
चाँद धीरे धीरे चले
फागुनी बयार कुछ अनकही कहे
चैता चित्त करे चंचल
तुम संग संग जो चले
Wednesday, February 18, 2009
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
धरती सजी है संवरी है पीली अलसी खिली है ॥
सब की आंखों में खुमार है , ढेर सरे सतरंगे सपने भी हैं ..
हवा धीरे धीरे छू रही हैं ..
सरे लक्षण वसंत के हैं
पर ना जाने क्यों मुझे लगता है
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
ऐसा नहीं की तुम नहीं हो यहाँ
तुम येही कही बैठी हो अपना सुब कुछ लेकर ॥
और अपना सुब कुछ किसी को उधार दे कर ...
यहाँ तुम्हारा तन बैठा हैं ..
मन कही और उदास बैठा ...
तभी तो
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
मेरे कई सतरंगे सपने हैं ..
पैर इनका क्या करून ...
मेरे सपने आम्र के बोरों की खुसबू लिए बैठे ..
महुआ के पेड़ के आस -पास भटक रही ॥
उसे लगता है तुम्हारा मन येही कहीं छुपा है।
मेरे सरे सतरंगी सपने उदास हैं ...
मेरे लिए ॥
इन वासंती हवाओं में ... ना वसंत का अल्हड़पन है ना पागलपन है ....
तो क्या करून ...
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
मैं दूर पहाड़ की चोटी पर बैठा ..
सबकी बातों को पर विचार कर रहा हूँ
ऊँची चोटी पे बैठा हूँ तो सब बौने लग रहे हैं ..
सब पयार में छोटे हो गए हैं खो गए हैं ...
मैं पहाड़ की चोटी पे बैठा गुरुता की भावना लिए हूँ ...
तो कैसे आयेगी वासन्ती हवा मेरे पास
फिर भी मैं कहता हूँ
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
धरती सजी है संवरी है पीली अलसी खिली है ॥
सब की आंखों में खुमार है , ढेर सरे सतरंगे सपने भी हैं ..
हवा धीरे धीरे छू रही हैं ..
सरे लक्षण वसंत के हैं
पर ना जाने क्यों मुझे लगता है
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
ऐसा नहीं की तुम नहीं हो यहाँ
तुम येही कही बैठी हो अपना सुब कुछ लेकर ॥
और अपना सुब कुछ किसी को उधार दे कर ...
यहाँ तुम्हारा तन बैठा हैं ..
मन कही और उदास बैठा ...
तभी तो
न वसंत है न वासंती हवा है न तुम हो ॥
मेरे कई सतरंगे सपने हैं ..
पैर इनका क्या करून ...
मेरे सपने आम्र के बोरों की खुसबू लिए बैठे ..
महुआ के पेड़ के आस -पास भटक रही ॥
उसे लगता है तुम्हारा मन येही कहीं छुपा है।
मेरे सरे सतरंगी सपने उदास हैं ...
मेरे लिए ॥
इन वासंती हवाओं में ... ना वसंत का अल्हड़पन है ना पागलपन है ....
तो क्या करून ...
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
मैं दूर पहाड़ की चोटी पर बैठा ..
सबकी बातों को पर विचार कर रहा हूँ
ऊँची चोटी पे बैठा हूँ तो सब बौने लग रहे हैं ..
सब पयार में छोटे हो गए हैं खो गए हैं ...
मैं पहाड़ की चोटी पे बैठा गुरुता की भावना लिए हूँ ...
तो कैसे आयेगी वासन्ती हवा मेरे पास
फिर भी मैं कहता हूँ
ना वसंत है ना वासंती हवा है ना तुम हो ...
Thursday, January 1, 2009
मृत्यु का गीत
आओ
इस नव वर्ष की शुभ वेला पर,
सब मिल कर मृत्यु का गीत गायें
नवजीवन का अलख जगाएं
अँधियारा ही सूरज को लेकर आता है
अम्बर पर ज्ञान प्रकाश फैलाता है
डरो मत आज इस नव वर्ष रुपी यज्ञ की वेदी पे ,
दे दो आहुति सारे कुविचारों की
असत अनैतिक के मृत्यु का गीत
खोले द्वार ,सदगुण के , नया विहान का , नया सूरज का
तो आओ आज हम साब मिलकर मृत्यु का गीत गायें
इस नव वर्ष की शुभ वेला पर,
सब मिल कर मृत्यु का गीत गायें
नवजीवन का अलख जगाएं
अँधियारा ही सूरज को लेकर आता है
अम्बर पर ज्ञान प्रकाश फैलाता है
डरो मत आज इस नव वर्ष रुपी यज्ञ की वेदी पे ,
दे दो आहुति सारे कुविचारों की
असत अनैतिक के मृत्यु का गीत
खोले द्वार ,सदगुण के , नया विहान का , नया सूरज का
तो आओ आज हम साब मिलकर मृत्यु का गीत गायें
मुझे समय बना दो
मुझे समय बना दो
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
मैं सिर्फ़ यही चाहता हूँ
इस नव वर्ष पर॥
मैं चलता रहूँगा
तुम सभी लोगों से आग्रह होगा
समय की शिला पर कुछ न कुछ लिखते रहना
मैं इक मूक दर्शक बन कर तुम्हारे कृत्यों की गवाही दूँगा॥
बस मुझे समय बना दो
मैं दीनता दैन्यता से परे रहूँगा । सुख दुःख माया मोह से परे रहे रहूँगा॥
ये सब कुछ आप की निरंतरता में बाधक हो जाती हैं॥
मेरा लक्ष्य तो समय बनना हैं
ईश्वर आप से मेरी यही प्रार्थना हैं मुझे समय बना दो
मैं खुद व् खुद अर्वाचीन हो जाऊंगा...
Wednesday, October 1, 2008
ये धमाके नये नहीं हैं.
आज संपूर्ण भारतवर्ष सहमा सा है घबराया सा है धमाकों से । ये धमाके नये नहीं हैं अनादी काल कब कब कब रहे हैं।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
कब नहीं हुआ है धमाका । गोरी और गजनी को कैसे भूल सकते हैं आप । कभी शालीन रहना भी अच्छा नहीं होता है । कभी हमें धर्मविरुता ले डूबी । कभी वीरता का अन्यथा दंभ । मैं भारत की दो बड़ी ऐतिहासिक भूलों की बातें कर रहा हूँ । सोमनाथ पराजय एवं गौरी को जीवनदान । शायद इन्ही गलतियों की सजा आज तक भारतवर्ष भुगत रहा है ।
इस के अलावा क्षेत्रीयता का भावः, भारत में लोग कभी ख़ुद को भारतवर्ष का मानते ही नहीं हैं। मैं बिहारी हूँ, बंगाली हूँ , उत्तर भारतीय हूँ , दक्षिण भारतीय हूँ आदि आदि । खुद को आर्यावर्त से जोड़ कर तो देखो। कुछ और दिनों तक बंगाली, बिहारी जैसी मानसकिता से अतिसय प्रेम ,भारतवर्ष को कई राष्ट्रों में बाँट सकता है ,फिर विदेशी आयेंगे और संपूर्ण भारतवर्ष गुलामी की जंजीर से जकड जाएगा
मेरी नजर में हम सभी को जहीरेले नाग की तरह हो जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा के लिए फुफकारता रहता हैं जिस से दुश्मन उस से दूर रहते हैं ।
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About Me
- Mukul
- मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो सोचता बहुत हूँ पर करता कुछ भी नहीं हूँ. इस से अच्छा मेरा परिचय कुछ भी नहीं हो सकता है मैं खयालों की दुनिया में जीने वाला इन्सान हूँ . सच्चाई के पास रह कर भी दूर रहने की कोशिश करता हूँ अगर सच्चाई के पास रहूँगा तो शायद चैन से नहीं रह पाउँगा पर हर घड़ी सत्य की तलाश भी करता रहता हूँ . शायद आप को मेरी बातें विरोधाभाषी लग रही होगी पर सच्चाई यही हैं.. ये बात सिर्फ मुझ पर हीं नहीं लागू होती है शायद हम में से ज्यादातर लोगों पर लागू होती है. मैं तो गांव में पला -बढा ,शहर की बारीकियों से अनजान इक गंवई इन्सान हूँ जिसे ज्यादातर शहर के तौर तरीके पता नहीं हैं.